Tuesday, 1 January 2013

NO RESERVSTION-JUST APPORTUNITY

जातिगत आरक्षण के पक्ष में पिछले 65 सालों से एक ही तर्क कहा जाता है कि इन जातियों पर सदियों से शोषण हुआ या अत्याचार हुए लेकिन इसके पक्ष में वही 2-4 घिसे पिटे उदाहरण जैसे एकलव्य का अंगूठा, छुआछूत के अलावा कोई भी नई बात नहीं कह पाते।
जबकि सही मायनो में इस पुरुष प्रधान  व्यवस्था में केवल और केवल इस धरती की आधी आबादी "नारी" का शोषण हुआ है। चाहे वो किसी भी जाति की रही हो।
उस पर अत्याचार हुए है।
इसके उदाहरण लाखो ही नहीं करोड़ों की संख्या में है।
चाहे अहिल्या पर गौतम ऋषि का हो या सूर्पनखा पर लक्ष्मण का, सीता पर रावण का हो या राम का, द्रोपदी पर कौरवों का आदि आदि।
हर युग में वो केवल रौंदी जाती रही है.
कभी कभी तो जन्म लेते ही मर दिया गया और कभी  जन्म से पहले ही
हर बार नारी को ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ी है।
कभी उसे कुल्टा कहा गया तो कभी डायन।
कभी उसे दहेज़ के लिए बलिदान देना पड़ा, तो कभी परिवार के लिए।
कभी बाँझ की तोहमत लगी तो कभी बाल विधवा की और कभी पुरुष जाति की हवस का शिकार बनी।
"दामिनी" जैसे ही उदाहरण लाखों की संख्या में मिल जायेंगे।
1947 से 1950 में जब जातीगत आरक्षण की व्यवस्था की जा रही थी, तब भारत की नारी की स्थिति कोई बहुत ज्यादा अच्छी नहीं थी।
न उसके पास कभी संपत्ति थी,
न  ही शिक्षा,
नौकरिओं का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।
उसके खेलने कूदने के दिनों में उसे बालिका वधू बना दिया जाता था, जिसमे वो बाल विधवा बन कर समाज का तिरस्कार भी झेलती रही है। लेकिन देश की आधी आबादी को आरक्षण देने के बारे में विचार ही नहीं किया गया ।
वर्तमान में जहाँ भी आरक्षण दिया गया वह वो सिर्फ अपने परिवार की राजनैतिक दुकान की sales woman बन कर रह गयी।
उनके पति बढ़िया से पार्षद पति, सरपंच पति, विधायक पति आदि का विजिटिंग कार्ड छपवा कर घूमते है।
लेकिन भारत की अभी तक रही सभी अविवेकी सरकारे आरक्षण   से आज तक एक भी एकलव्य, बाल्मीकि, रैदास, कबीर, अम्बेडकर आदि जैसा यशस्वी व्यक्ति निर्मित नहीं कर सकी,
परन्तु  जैसे ही महिलाओं को आरक्षण के स्थान पर अवसर दिया गया वो 
"तीजन बाई",  "इंद्रा नूई" की तरह विश्व पटल पर छा गई  या
कल्पना चावला, सुनीता विलियम के रूप में अन्तरिक्ष की उचाईयों को भी छूने लगी।
आरक्षण राजनैतिक दलों की दोहरी मानसिकता का प्रतीक है। जो उनकी कथनी और करनी के अंतर को दर्शाता है। सामाजिक समरसता की बात के विपरीत आरक्षण लोगो में बिभेद करता है।  देश की एकता अखंडता  को कायम रखने के विपरीत लोगो में आरक्षण वैमंश्यतः पैदा कर विघटन की स्थितिया पैदा करता  है। आरक्षण का आधार योग्यता नहीं जाति , धर्म, लिंग आदि होना योग्य लोगो में कुंठा पैदा कर, साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देता है। आरक्षण मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर देश की आर्थिक स्थिति ख़राब करता है।
देश के लोगो को आरक्षण की नहीं अवसर की जरूरत है।
आरक्षण हटाओ - देश बचाओ
-सवर्ण समाज पार्टी-